शुभ मंगल का प्रतिक स्वस्तिक 

शुभ मंगल  का प्रतिक स्वस्तिक 

पुरे युरेशिया (यूरोप और एशिया) में स्वस्तिक पुरातन धार्मिक चिन्ह के रूप में जाना जाता है। भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक को देवत्य और आध्यात्मिकता के प्रतिक के रूप में उपयोग किया जाता रहा है।

1930 के दशक तक पश्चिमी दुनिया में स्वस्तिक शुभ और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता था,

किन्तु हिटलर और नाज़ीयों के अपनाने के बाद से स्वस्तिक आर्यन पहचान के प्रतीक के रूप में जाना जाने लगा और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से पश्चिमी दुनिया के अधिकांश लोग इसे नाजीवाद से जोड़ के देखने लगे। 

शुभ मंगल का प्रतिक स्वस्तिक 
शुभ मंगल का प्रतिक स्वस्तिक 

पुरे भारत वर्ष में स्वस्तिक को शुभ-मंगल और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है और हर मांगलिक कार्य के पहले इसे उकेरा जाता है। ऐसी मान्यता है की स्वस्तिक समृद्धि और सौभाग्य ले कर आता है।

जैन धर्म में 24 तीर्थंकरों में सातवें तीर्थंकर सुपार्शवनाथ हैं और स्वस्तिक को उनका प्रतिक मन जाता है। बौद्ध धर्म में स्वस्तिक को बुद्ध के शुभ पदचिह्नों का प्रतीक मन जाता है।

सिर्फ भारत ही नहीं प्राचीन कई संस्कृतियों में स्वस्तिक को समृद्धि के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था।

इसके प्रमाण मिस्र, ग्रीस, इटली, जापान, इंग्लैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे विभिन्न देशों और दुनिया भर में खोजी गई विभिन्न कलाकृतियों पर पाया जाता है। स्वस्तिक का उपयोग कई धर्मो और देशों में मिलता है किन्तु इसकी सबसे साफ व्याख्या हिन्दू धर्म में ही मिलती है।