Pashupatinath temple | पशुपतिनाथ मंदिर | Pashupatinath Temple | Ganesh

पशुपतिनाथ मंदिर | Pashupatinath Temple

Pashupatinath temple


पशुपतिनाथ मंदिर | Pashupatinath Temple

pashupatinath temple

pashupatinath temple
पशुपतिनाथ मंदिर
pashupatinath temple

पशुपतिनाथ मंदिर
काठमांडू,
नेपाल

शंकर भगवान को समर्पित हिन्दुओं का एक सबसे पवित्र मंदिर है पशुपति नाथ मंदिर जो की काठमांडू नेपाल में स्थित है। पशु का मतलब होता है जीव या प्राणी और पति का अर्थ है स्वामी और नाथ का अर्थ होता है भगवान या मालिक। तो पशुपतिनाथ का अर्थ हुआ सभी जीवों के स्वामी, सभी प्राणियों के भगवान। भारत में भी एक पशुपतिनाथ मंदिर है जो की मध्य प्रदेश के मंदसौर में है। मंदसौर और नेपाल दोनों ही जगह पशुपतिनाथ मंदिर में शिव जी की मुर्तियां समान आकृति वाली है। नेपाल का पशुपतिनाथ मंदिर बागमती नदी के किनारे स्थित है और इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल किया गया है।

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यह मंदिर हिमालय की गोद में है और पुरे विश्व से शिव भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है। ऐसा कहा जाता है की नेपाल पशुपतिनाथ मंदिर में जो शंकर जी का शिवलिंग है वो पारस पत्थर के सामान है। इस मंदिर में पाँच मुखी शिवलिंग है, चार मुख चारों दिशाओं में और एक मुख ऊपर की ओर है। शिवलिंग पर अंकित प्रत्येक आकृति के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंदल मौजूद है। कहते हैं कि ये पांचों मुंह अलग-अलग दिशा और गुणों का परिचय देते हैं। पूर्व दिशा की ओर वाले मुख को तत्पुरुष और पश्चिम की ओर वाले मुख को सद्ज्योत कहते हैं।

उत्तर दिशा की ओर वाले मुख को वामवेद या अर्धनारीश्वर कहते हैं और दक्षिण दिशा वाले मुख को अघोरा कहते हैं। जो मुख ऊपर की ओर है उसे ईशान मुख कहा जाता है। मंदिर में शिवलिंग तक पौंछने के चार द्वार है और पश्चिम द्वार के ठीक सामने पीतल के नन्दी विराजमान हैं। पशुपतिनाथ मंदिर परिसर में वैष्णव और शैव परंपरा के कई मंदिर और प्रतिमाएं है। पशुपतिनाथ मंदिर के संबंध में यह मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस स्थान के दर्शन करता है उसे किसी भी जन्म में फिर कभी पशु योनि प्राप्त नहीं होती है। हालांकि शर्त यह है कि पहले शिवलिंग के पहले नंदी के दर्शन ना करे। यदि वो ऐसा करता है तो फिर अलगे जन्म में उसे पशु बनना पड़ता है। पशुपतिनाथ मंदिर के निर्माण को लेकर कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है किन्तु यह निश्चित तौर पर ज्ञात है की मंदिर का निर्माण सोमदेव राजवंश के पशुप्रेक्ष ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में कराया था। 605 ईस्वी में अमशुवर्मन ने भगवान के चरण छूकर अपने को अनुग्रहीत माना था। बाद में इस मंदिर का पुन: निर्माण लगभग 11वीं सदी में किया गया था |

एक कथा के अनुसार भगवान शिव चिंकारे का रूप धारण कर निंद्रा में चले गए। देवता उन्हें ढूँढ़ते हुऐ यहाँ पहुंचे और वापस वाराणासी ले जाने के प्रयास में चिंकारे ने नदी की दूसरी ओर छलांग लगा दी जिसमें उसके सींग टूट गए। इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में यहां प्रकट हुए थे। एक दुसरी कथा के अनुसार कामधेनु गाय रोज अपना दुध किसी स्थान पर चढ़ा दिया करती थी जब चरवाहे ने खोज की तो पशुपतिनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग उसे प्राप्त हुआ। तीसरी कथा के अनुसार इस मंदिर का संबंध केदारनाथ मंदिर से है।

कहा जाता है जब पांडवों को स्वर्गप्रयाण के समय शिवजी ने भैंसे के स्वरूप में दर्शन दिए थे जो बाद में धरती में समा गए लेकिन पूर्णतः समाने से पूर्व भीम ने उनकी पुंछ पकड़ ली थी। जिस स्थान पर भीम ने इस कार्य को किया था उसे वर्तमान में केदारनाथ धाम के नाम से जाना जाता है। एवं जिस स्थान पर उनका मुख धरती से बाहर आया उसे पशुपतिनाथ कहा जाता है। पुराणों में पंचकेदार की कथा नाम से इस कथा का विस्तार से उल्लेख मिलता है।  

Pashupatinath Temple
pashupatinath temple

Pashupatinath Temple
Kathmandu,
Nepal

One of the most sacred temples dedicated to Shankar Bhagwan is Pashupati Nath Mandir situated in Kathmandu Nepal. Pashu means creature, Pati and partner and Nath means God or master. Then Pashupatinath means the Lord of all creatures, God of all creatures. There is also a Pashupatinath temple in India which is in Mandsaur in Madhya Pradesh.

Shiva’s idols are similar in the Pashupatinath temple at Mandsaur and Nepal. Nepal’s Pashupatinath temple is situated on the bank of the river Bagmitya and it has been included in the UNESCO World Heritage Site. This temple is in the lap of the Himalayas and attracts Shiva devotees from all over the world. It is said that in the Pashupatinath temple of Nepal, the Shivalinga of Shankar Ji is similar to Paras stone. There are five Mukhi Shivaling in this temple, four faces in four directions and one face upwards. There’s Rudraksha garland in the right hand of every shape on the Shivling, and the loincloth in the left hand is present. It is said that these five mouths introduce different directions and qualities. 

East side facing face is called Tatpurush, west side face is called Sadyjot, north side face is called Vamdev or Ardhnareshwar wheras ssouth side face is called Aghora. The face which is facing upwards is called the Ishan Mukh. In the temple, there are four gates to reach till Shivalinga and in front of the western door, the bronze nandi is seated. There are many temples and statues of Vaishnava and Shaiva tradition in Pashupatinath temple complex.

Regarding the Pashupatinath temple, it is believed that a person who visits Pashupatinath temple twice and worships shiv jee will never get birth as animal in any of his future births. However, the condition is that before the first Shivling, Nandini should not be seen. If he does this, then he has to become an animal in the next life. There is no historical evidence available for the construction of Pashupatinath temple, but it is certainly known that the temple was constructed by Somdev Dynasty in the third century BC. In 605 AD, Amshuvarman considered himself to be blessed by touching the feet of God. Later this temple was rebuilt in the 11th century.

According to one legend, Lord Shiva took the form of Deer and went to sleep. While searching for him, the deity arrived here and in an attempt to take Varanasi back, Deer jumped on the other side of the river, in which his horn broke. After this, Lord Pashupati with his four faces appeared here. According to a second story, Kamdhenu cow use to give her milk at some place when the shepherd searched for it, he found Shivling which is now in Pashupatinath temple.

According to the third story, this temple is related to Kedarnath temple. It is said that when Pandavas were on the way to Heaven, Shiva had appeared in the form of a buffalo and disappeared in earth but before fully assimilating, Bhima had caught his tail. The place where Bhima did this work, is now known as Kedarnath Dham. And the place where his face came out of the earth is called Pashupatinath. This legend is mentioned in detail in the Puranas by the story of Panchkadar.

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