नीलकंठ की सच्चाई

धर्म ग्रंथों के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण स्वर्ग श्रीहीन (ऐश्वर्य, धन, वैभव आदि) हो गया। तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने उन्हें असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने का उपाय बताया और ये भी बताया कि समुद्र मंथन को अमृत निकलेगा, जिसे ग्रहण कर तुम अमर हो जाओगे। यह बात जब देवताओं ने असुरों के राजा बलि को बताई तो वे भी समुद्र मंथन के लिए तैयार हो गए। वासुकि नाग की नेती बनाई गई और मंदराचल पर्वत की सहायता से समुद्र को मथा गया। समुद्र मंथन से उच्चैश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, लक्ष्मी, भगवान धन्वन्तरि सहित 14 रत्न निकले।

जब देवताओं और असुरों ने सागर मंथन किया तो अमृत और अन्य कई अमूल्य वस्तुओं के साथ सागर में से विष भी निकला, इस विष के प्रकोप से जन साधारण को हानि पहुंचने लगी। तब देवताओं के विनती करने पर महादेव ने वो विष पी लिआ जिस से उनका गाला नीला पड़ गया और उस समय से महादेव की नीलकंठ नाम से उनकी जय जय कार होने लगी।

नीलकंठ महादेव की ये यात्रा हरिद्वार-ऋषिकेश यात्रा का तीसरा पड़ाव है। ऋषिकेश से 32 कि. मी. की दुरी पर पौड़ी गढ़वाल में स्थित है भोले शंकर का ये मंदिर। ऊँची ऊँची पहाड़ियों से घिरा ये मंदिर मन को अत्यंत प्रसन्ता देने वाला है।

17 जुलाई से शुरू होगी कांवड़ यात्रा और नीलकंठ यात्रा

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