महामेरु पंचमुखी गणेश मंदिर 


महामेरु पंचमुखी गणेश मंदिर 

कर्नाटक की राजधानी बंगलुरू के पास केनगेरी में स्थितः 

बंगलुरु से मैसूर जाते हुऐ महामेरु पंचमुखी गणेश मंदिर रास्ते में आता है और काफ़ी दुर से ही मंदिर को देखा जा सकता है।

जैसा की नाम से ज्ञात होता है महामेरु पंचमुखी गणेश मंदिर में स्थापित गणेश प्रतिमा के पाँच मुख हैं जो की चार दिशाओं की ओर देखते हैं।

श्री गणेश का पाँचवा मुख सब ऊपर की ओर है और मन्दिर दे द्वार की दिशा की ओर है। मंदिर के ऊपर क्षितिज पर पंचमुखी गणेश की यह विशाल प्रतिमा है जो की पूर्ण रूप से सुनहरे रंग की है।

इसी प्रकार मंदिर के अंदर भी श्री गणेश की पंचमुखी प्रतिमा स्थापित की गयी है जो की काले पत्थर से निर्मित है।

मंदिर में गणेश प्रतिमा का एक मुख मुर्ति के ऊपर पिरामिड-आकार देकर सामने की ओर स्थित है और इसलिए इसे महामेरु गणेश नाम दिया गया है।

महामेरु का अर्थ होता है सबसे ऊपर शीर्ष पर। मंदिर के एक और खासियत है, मंदिर कर निर्माण ‘श्री चक्र’ के सिद्धान्त अनुसार किया गया है।

श्री यंत्र या श्री चक्र, हिंदू तंत्र के श्री विद्या विद्यालय में उपयोग किए जाने वाले रहस्यमयी आरेख (यंत्र) का एक रूप है।

इसमें नौ इंटरलॉकिंग त्रिकोण होते हैं जो एक केंद्रीय बिंदु को एक बिन्दु के रूप में घेरते हैं। ये त्रिकोण ब्रह्मांड और मानव शरीर का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जब दो आयामी श्री यंत्र को तीन आयामों में दर्शाया जाता है, तो इसे महा मेरु कहा जाता है। मेरु पर्वत बिलकुल इसी आकृति जैसा है और दोनों में समानता  पर्वत को महा मेरु कहा। 

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भगवान श्री कृष्ण और गोपियों की सुन्दर और दुर्लभ सत्य कथा


एक बार गोपियों ने श्री कृष्ण से कहा की ‘हे कृष्ण हमे अगस्त्य ऋषि को भोग लगाने जाना है, और ये यमुना जी बीच में पड़ती है अब बताओ कैसे जाये

भगवान श्री कृष्ण ने कहा की जब तुम यमुना जी के पास जाओ तो कहना की, हे यमुना जी अगर श्री कृष्ण ब्रह्मचारी है तो हमे रास्ता दे।

गोपियाँ हंसने लगी की लो ये कृष्ण भी अपने आप को ब्रह्मचारी समझते है, सारा दिन तो हमारे पीछे पीछे घूमता है, कभी हमारे वस्त्र चुराता है कभी मटकिया फोड़ता है … 

खैर फिर भी हम बोल देगी ।

 

गोपियाँ यमुना जी के पास जाकर कहती है, हे यमुना जी अगर श्री कृष्ण ब्रह्मचारी है तो हमे रास्ता दे, और गोपियों के कहते ही यमुना जी ने रास्ता दे दिया।

गोपिया तो सन्नन रह गई ये क्या हुआ कृष्ण ब्रह्मचारी ?

 

जब गोपियाँ अगस्त्य ऋषि को भोजन करवा कर वापिस आने लगी तो अगस्त्य ऋषि से कहा की अब हम घर कैसे जाये यमुना जी बीच में है।

 

अगस्त्य ऋषि ने कहा की तुम यमुना जी को कहना की अगर अगस्त्य जी निराहार है तो हमे रास्ता दे,

गोपियाँ मन में सोचने लगी की अभी हम इतना सारा भोजन लाई सो सब गटका गये और अब अपने आप को निराहार बता रहे है?

 

गोपियाँ यमुना जी के पास जाकर बोली, हे यमुना जी अगर अगस्त्य ऋषि निराहार है तो हमे रास्ता दे और यमुना जी ने रास्ता दे दिया ।

 

गोपिया आश्चर्य करने लगी की जो खाता है वो निराहार केसे हो सकता है ?

 

और जो दिन रात हमारे पीछे पीछे फिरता है वो ब्रह्मचारी केसे हो सकता है ?

 

 इसी उधेड़ बूंद में गोपियों ने कृष्ण के पास आकर फिर से वही  प्रश्न किया,

 

भगवान श्री कृष्ण कहने लगे गोपियों मुझे तुम्हारी देह से कोई लेना देना नही है, मैं तो तुम्हारे प्रेम के भाव को देख कर तुम्हारे पीछे आता हूँ. मैंने कभी वासना के तहत संसार नही भोगा मैं तो निर्मोही हूँ इस लिए यमुना ने आप को मार्ग दिया,

 

तब गोपियाँ बोली भगवन मुनिराज ने तो हमारे सामने भोजन ग्रहण किया फिर भी वो बोले की अगत्स्य आजन्म उपवाशी हो तो हे यमुना मैया मार्ग देदे !!!!!!!!!!!!

और बड़े आश्चर्य की बात है कि यमुना ने मार्ग देदिया!!!!!!!

 

श्री कृष्ण हंसने लगे और बोले कि अगत्स्य आजन्म उपवाशी है ।

अगत्स्य मुनि भोजन  ग्रहण करने से पहले मुझे भोग लगाते है 

और उनका भोजन में कोई मोह नही होता उनको कतई मन में नही होता की मैं भोजन करु या भोजन कर रहा हूँ

वो तो अपने अंदर रह रहे मुझे भोजन करा रहे होते है इस लिए वो आजन्म उपवासी हैं।

 

जो मुझसे प्रेम करता है मैं उनका सच में ऋणि हूँ मैं तुम सबका ऋणि हूँ।

राधे राधे।


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हनुमान


श्री हनुमान चालीसा

-: दोहा :-
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निजमनु मुकुरु सुधारि
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार



हनुमान जी की आरती

आरती कीजै हनुमान लला की।
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

जाके बल से गिरिवर कांपे।
रोग दोष जाके निकट न झांके।।


श्री शनि देव

Jagannathv
शनि चालीसा

॥दोहा॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल ।दीनन के दुःख दूर करि, कीजै नाथ निहाल ॥ जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज ।करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज ॥

Jagannathv
शनि कवचं

अथ श्री शनिकवचम्
अस्य श्री शनैश्चरकवचस्तोत्रमंत्रस्य कश्यप ऋषिः IIअनुष्टुप् छन्दः II शनैश्चरो देवता II शीं शक्तिः II शूं कीलकम् II शनैश्चरप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः IIनिलांबरो नीलवपुः किरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान् II

श्री राम

Jagannathv

श्री राम चालीसा

श्री रघुवीर भक्त हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
निशिदिन ध्यान धरै जो कोई। ता सम भक्त और नहिं होई॥1॥
ध्यान धरे शिवजी मन माहीं। ब्रह्म इन्द्र पार नहिं पाहीं॥
दूत तुम्हार वीर हनुमाना। जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना॥2॥

Jagannathv

आरती श्री राम जी

श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन, हरण भवभय दारुणम्।
नव कंज लोचन, कंज मुख कर कंज पद कंजारुणम्॥
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन
कन्दर्प अगणित अमित छवि, नव नील नीरद सुन्दरम्।
पट पीत मानहुं तड़ित रूचि-शुचि