महादेव के पहनावे और ऊसके पीछे के रहस्य – ऐसे तथ्य जो शायद आपको नहीं पता 

श्री गणेश के बारे में रोचक तथ्य

महादेव चित्र में आपने देखा होगा की वो शरीर के निचले हिस्से में व्याघ्र चर्म से लपेटे रहते हैं, देह पर भस्म है, एक हाथ में डमरू और दुसरे में त्रिशूल है, मस्तिष्क पर तिसरी आंख है और गले में रुद्राक्ष की माला है सर्प भी लिप्त हुआ है। वे कैलाश पर्वत पर बैठे हैं और वृषभ की सवारी करते हैं। जटाएँ काफ़ी बड़ी हैं और उनमे आधा चंद्र है  साथ ही केशों से गंगा निकल रही है। 

आइये हम इन सभी चिन्हों के पीछे छुपे रहस्य और उनके अर्थों से आपका परिचय करते हैं 

mahadev ke pahnave ke rahasya
– महादेव देह पर दो प्रकार की चार्म धारण करते हैं हस्ति चर्म और व्याघ्र चर्म। हस्ति चर्म हाथी की चार्म होती है, हाथी में उसके विशाल और बलशाली शरीर के कारण अहंकार होता है। व्याघ्र चर्म शेर के चार्म को कहा जाता है और शेर बहुत ही हिंसक प्रवृति का होता है। शिव जी हस्ति चर्म और व्याघ्र चर्म धारण भी करते हैं और उस पर विराजमान भी होते हैं जिसका अर्थ होता है की महादेव का अहंकार और हिंसा दोनों पर ही पूरा नियंत्रण है। यह सभी शिव भक्तों को अहंकार और हिंसा पर नियंत्रण रख उसे दबाने के लिए प्रेरित करता है। 
 
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– देह पर भस्म – भस्म बदलाव का प्रतिक है। भस्म अंत का प्रतीक है।सुन्दर या कुरूप, विशाल या सुक्ष्म, उपयोगी या अनुपयोगी, जीवित या मृत, चलित या स्थायी, आमिर या गरीब, स्वस्थ या बीमार एक दिन सब कुछ भस्म के रूप में बदल जायेगा। महादेव हमे बताना कहते हैं की जब संसार में सब कुछ भस्म हो जायेगा तब केवल भस्म ही शेष रह जाएगी। भस्म मोह, आकर्षण, लालच, ईर्ष्या से मुक्ति का सन्देश देती है।
 
 
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– महादेव के एक हाथ में त्रिशूल रहता है – त्रिशूल में एक ही दिशा में प्रहार करने वाली तीन नोंक शूल होती हैं जो की एक ही वॉर में तीन लक्ष्यों को भेद सकती हैं। हम त्रिशूल को तीन शाक्तियों का एक में समावेश वाले अस्त्र के रूप में भी देख सकते हैं। जैसे की त्रिदेव, हमारे तीन देव – ब्रह्माः, विष्णु और महेश। तीन देवियां सरस्वती, लक्ष्मी और काली। प्रकृति के तीन रूप सृजन, अनुरक्षण और विनाश। तीन काल – भुत, वर्तमान और भविष्य। तीन शक्तियां – सत, रज और तम। तीन लोक – स्वर्ग लोक , भू लोक और पातळ लोक। तीन मनोस्थिती – ईच्छा, कर्म और विवेक। तीन प्रकार के कष्ट – शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक। त्रिशूल बताता है की शिव तीनों भूमिकाओं के अधिपति हैं। 
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–  महादेव के एक हाथ में डमरू रहता है  – महादेव को संगीत का जनक भी मन जाता है। जब महादेव आनंद फैलाना कहते हैं तब वे डमरू बजाते हैं और नृत्य करते हैं। डमरू हम मनुष्यों को अपने दैनिक कर्त्तव्यों बीच समय निकाल प्रसन और आनंदित होने का संकेत देता है। 
 
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– मस्तिष्क पर तिसरी आंख – जिसे त्रिनेत्र भी कहते हैं और महादेव को ‘त्रिलोचन’ भी कहा जाता है। शिव जी का तीसरा नेत्र आधा बंद और आधा खुला हुआ है जो हमे संसार और सन्यास का सन्देश देता है की ध्यान-साधना या संन्यास में रहकर भी संसार की जिम्मेदारियों को निभाया जा सकता है। 

 

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– गले में सर्प – ऐसा माना जाता है की समुद्र मंथन के समय जब विष निकला तो देवता और असुर दोनो ही भयभीत हो गये और महादेव गए की वे ही कोई रास्ता सुझाएँ। विश्व की रक्षा करने के लिए शिव जी ने विष पि लिया किन्तु इससे पहले की वे विष निगल पाते पार्वती जी ने उनके कंठ को दबा दिया और विष के कारण महादेव का कंठ नीला पड़ गया। नीले कंठ के कारण  महादेव को नीलकंठ भी कहा जाता है। पार्वती जी के लिये सदा ही शिव जी के कंठ को दबा के रखना संभव नहीं था और इसलिए उन्होंने सर्प को शिव जी के गले में बांध दिया। कुछ और मान्यताओं के अनुसार शिव जी के गले में सर्प महादेव की डर और मृत्यु पर नियंत्रण को दर्शाता है। शिव जी को पशुपतिनाथ भी कहा जाता है जिसका अर्थ होता है सभी जिव-जन्तुओं के स्वामी। 

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– रुद्राक्ष की माला – ऐसा माना जाता है की रुद्राक्ष की उत्पत्ति शिव के आँसुओं से हुई थी। रुद्राक्ष में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है जो की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा का संतुलन बनाये रखता है। रुद्राक्ष की माला से मंत्र जाप करने से मंत्र का असर कई गुना बढ़ जाता है और ग्रहों को नियंत्रित करने के लिए सबसे रुद्राक्ष को सबसे उत्तम माना गया है।  
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शिव की सवारी नन्दी

– शिव की सवारी नन्दी – शिलाद ऋषि को महादेव की तपस्या कर नन्दी नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। एक बार उनके आश्रम पर दो संन्यासियों का आगमन हुआ और नन्दी की सेवा से प्रसन हो कर उन्होंने शिलाद ऋषि को दीर्घायु होने का आशीर्वाद दिया। शिलाद ऋषि ने जब इसका कारण पुछा को संन्यासियों ने कहा की नन्दी अल्पायु है यह सुन शिलाद ऋषि काफी चिंतित रहने लगे। जब नन्दी को पिता की चिंता का कारण पता चला तो उन्होंने शिव जी की घोर तपस्या की। महादेव नन्दी से प्रसन हुऐ और नन्दी को वरदान माँगने को कहा, इस पर नन्दी ने कहा की वो सारा जीवन महादेव के साथ रह कर उनकी सेवा करना चाहता है। शिव जी नन्दी से बहुत प्रसन हुऐ और उन्होंने नंदी को अपना परम मित्र बनाया और बैल का स्वरूप दे अपने वाहन के रूप में स्थान दिया।

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कैलाश पर्वत

– कैलाश पर्वत – महादेव के बारे में यह कहा जाता है की वे कैलाश पर्वत पर विराजमान हैं। कैलाश पर्वत हिमालय पर्वत श्रंखला में है और बहुत ही पवित्र माना जाता है। कैलाश पर्वत उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव  बिलकुल बीच में स्थित है और इसलिए इसे धरती का केंद्र भी कहा जाता है। कैलाश को दुनिया की नाभि या आकाशीय ध्रुव और भौगोलिक ध्रुव का केंद्र भी माना जाता है। यह आकाश और पृथ्वी के बीच एक ऐसा बिंदु है जहाँ दसों दिशाएँ मिल जाती हैं। कैलाश पर्वत अलौकिक शक्ति का केंद्र है। कैलाश पर्वत पर मानसरोवर जो की सूर्य के आकर की दुनिया की शुद्ध पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और दुनिया की उच्चतम खारे पानी की झीलों में से एक राक्षस जो की चंद्र के आकर की है, स्थित हैं। ये दोनों झीलेँ  सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा को दर्शाती हैं। दक्षिण से देखने पर एक स्वस्तिक चिह्न देखा जा सकता है। ऊपरोक्त सभी बातें कैलाश पर्वत को रहस्य्मय बनती हैं। 

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महादेव की जटाओं चंद्रमा और गंगा – समुद्र मंथन के समय जब शिव जी ने विष पि लिया था तो  शरीर का तापमान बढ़ने लगा और तापमान को काम करने लिए शिव जी ने चन्द्रमा को अपनी जटाओं धारण कर लिया। चन्द्रमा को मन का करक भी कहा गया है और शिव जी हमे चन्द्रमा की शीतल प्रवृति के अनुसार अपने मन को शांत रखने का सन्देश हैं। महादेव की जटाओं से गंगा का प्रवाह हमे अहँकार से बचने का संदेश देता है। इसके पीछे की मान्यता है की जब राजा भागीरथ ने गंगा से पृथ्वी पर आने का आग्रह किया तो गंगा ने कहा की अगर वे सीधे स्वर्ग से पृथ्वी पर आयेंगी तो पृथ्वी उनके वेग से ध्वस्त हो जाएगी। राजा भागीरथ ने यह बात भोलेनाथ को बताई और कहा की अब आप ही संसार के उद्दार के लिए के लिये कुछ करें। महादेव ने गंगा को स्वर्ग से अपने सिर पर उतरने को कहा और फिर उसे अपनी जटाओं में कैद कर लिया। गंगा सब कुछ करने के बाद भी शिव जी की जटाओं से निकल ना सकी और अपने अहँकार के लिए क्षमा माँगी। तब शिव ने अपनी जटाओं से गंगा को एक पोखर में छोड़ा और फिर गंगा वहाँ से सात धाराओं में प्रवाहित हुई

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