श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर, पुरी ओडिशा 

श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर, पुरी ओडिशा 

श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर, पुरी ओडिशा 

श्री जगन्नाथ मंदिर विष्णु भगवान को समर्पित है क्यूंकि श्री जगन्नाथ भगवान महा विष्णु का ही एक रूप हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार त्रेता युग में राजा इंद्रद्युम्न विष्णु भगवन का बहुत बड़ा भक्त था। एक बार उसके दरबार में एक व्यक्ति आया और उसने राजा को बताया की ओडिशा में विष्णु जी को उनके सबसे अच्छे स्वरुप ‘नीलमाधव’ के रूप में काफी पहले से पूजा जाता आ रहा है।

राजा इंद्रद्युम्न अपने प्रिय विष्णु जी के दर्शन को उतावला हो गया और तुरंत ही अपने प्रमुख पुजारी विद्यापति को ओडिशा जा कर पता करने को कहा। विद्यापति जब ओडिशा पहुंचा तो पाया की कबीले के राजा विश्ववसु नीलमाधव को गुप्त रूप से पुजता है किन्तु बड़े आग्रह के बाद भी नीलमाधव का स्थान बताने को तैयार नहीं हुआ। विद्यापति ने रुक कर और प्रयत्न करने का सोचा।

इसी बीच विद्यापति और विश्ववसु के बीच प्रेम हो गया और उन दोनों की शादी हो गयी। शादी के बाद विद्यापति ने अपनी पत्नी से कहा की वो किसी भी तरह अपने पिता से बोलकर सिर्फ एक बार उससे नीलमाधव के दर्शन करवा दे। विश्ववसु बेटी का आग्रह न ठुकरा सका पर उसने शर्त रखी की विद्यापति को आँखों पर पट्टी बांध कर उसके साथ जाना होगा। विद्यापति ने शर्त मान ली पर साथ ही पुरे रास्ते सरसों के बीज़ डालता चला गया। विद्यापति ने राजा इंद्रद्युम्न को नीलमाधव के स्वरूप का वर्णन किया तो राजा भी उनके दर्शन को उत्सुक हूँ गया और तुरन्त ही विद्यापति के साथ गुप्त स्थान के लिए निकल पड़ा। किन्तु जब वे गुप्त स्थान पर सरसों के पौधों द्वारा दिखाये मार्ग से पहुंचे तो वहाँ नीलमाधव को नहीं पाया। राजा इससे बहुत दुखी हुआ और सोचने लगा की क्या वो कभी नीलमाधव के दर्शन कर पायेगा। तभी उन्हें एक पवित्र आवाज ने राजा को पुरी समुद्र तट पर जा कर एक ऐसे लकड़ी के तने को ढूंढ़ने को कहा जो की पानी में तैर रहा हो। राजा ऐसा समुद्र में तैरता हुआ लकड़ी का तना ढूंढ तो लाया लेकिन कोई भी कारिगर लकड़ी के कठोर होने के कारण उस पर काम करने में असमर्थ था। और क्यूँकि विष्णु भगवान की कोई पुराणी मूर्ति नहीं थी इसलिये कारिगरों को पता भी नहीं था की वे मूर्ति बनाएं कैसी। 

जगन्नाथ पुरी
By RJ RiturajOwn work, CC BY-SA 3.0, Link

तब वहाँ स्वयं विश्वकर्मा एक बूढ़े कारीगर के रूप में प्रकट हुऐ और राजा को कहा के वो मूर्तियाँ बना देंगे पर उनकी शर्त है की कोई भी, जब तक वो खुद न बोलें न उनके कमरे में आएगा और न ही देखने की कोशिश करेगा की वो क्या कर रहे हैं। शुरू के कुछ दिन तक कमरे से लकड़ी पर काम करने की आवाजें आती रही लेकिन जब ६-७ दिन तक कोई ध्वनि नहीं सुनाई दी तो रानी ने राजा से ज़िद कर द्वार खुलवाने को कहा। दरवाज़ा खोलते ही मुर्तिकार कमरे से गायब हो गया पर ३ अधुरी बनी मूर्तियाँ वहीँ थी। राजा ने अपनी गलती को स्वीकारा और उन्ही ३ अधुरी मुर्तियों के लिए मंदिर का निर्माण करवाया जो की आज श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर कहलाता है। यहाँ आज भी मूर्तियाँ वही हैं जो की राजा इंद्रद्युम्न ने स्थापित करवाई थी। श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर में विष्णु जी मतलब श्री जगनाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियां हैं। श्री जगन्नाथ पुरी जीवन को उत्सव के रूप में जीने का मार्ग दर्षाते हैं।