मुंबई के सबसे अमीर गणपति मंडल : GSB सेवा किंग्स सर्कल


जीएसबी सेवा किंग्स सर्कल

जीएसबी सेवा किंग्स सर्कल को मुंबई के सबसे आमिर गणेश पंडाल का दर्जा प्राप्त है। यह स्वर्ण गणेश के नाम से भी जाना जाता है, यहाँ की गणेश मूर्ति 60 किलोग्राम से अधिक सोने के आभूषणों से सजी है।

इस मंडल की स्थापना 1954 में कर्नाटक के गौड़ सारस्वत ब्राह्मण समुदाय द्वारा की गई थी। भव्य गणेश उत्सव का आयोजन और विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों का संचालन इस समुदाय द्वारा मुंबई शहर और गणपति में उनकी श्रद्धा का प्रतिक है।

इस समुदाय का मानना है की मुंबई शहर और गणपति की कृपा से उन्होंने समृद्धि प्राप्त की है।  

मंडल कई बातो का विशेष रूप से धयान भी रखता है जैसे की पुरे समय पंडाल में चलने वाला संगीत पारंपरिक भारतीय संगीत वाद्ययंत्र द्वारा उत्पन्न होता है,

जैसा की दक्षिण भारतीय मंदिरों में किया जाता है। यहाँ हर वर्ष मिट्टी से पर्यावरण के लिए अनुकूल मूर्ति ही बनायीं जाती है। आयोजन केवल 5 दिनों का होता है। 

मुंबई के सबसे अमीर गणपति मंडल

स्थान: जी.एस.बी. स्पोर्ट्स क्लब ग्राउंड, नियर एस.एन.डी.टी. महिला महाविद्यालय, आर.ए. किदवई रोड, किंग्स सर्कल, माटुंगा (मध्य मुंबई)।

निकटतम रेलवे स्टेशन: हार्बर लाइन पर किंग्स सर्कल और सेंट्रल लाइन पर माटुंगा।

कब जाएं: यह गणेश प्रतिमा केवल त्योहार के पहले पांच दिनों तक रहती है। 

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    भगवान श्री कृष्ण और गोपियों की सुन्दर और दुर्लभ सत्य कथा


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    भगवान श्री कृष्ण ने कहा की जब तुम यमुना जी के पास जाओ तो कहना की, हे यमुना जी अगर श्री कृष्ण ब्रह्मचारी है तो हमे रास्ता दे।

    गोपियाँ हंसने लगी की लो ये कृष्ण भी अपने आप को ब्रह्मचारी समझते है, सारा दिन तो हमारे पीछे पीछे घूमता है, कभी हमारे वस्त्र चुराता है कभी मटकिया फोड़ता है … 

    खैर फिर भी हम बोल देगी ।

     

    गोपियाँ यमुना जी के पास जाकर कहती है, हे यमुना जी अगर श्री कृष्ण ब्रह्मचारी है तो हमे रास्ता दे, और गोपियों के कहते ही यमुना जी ने रास्ता दे दिया।

    गोपिया तो सन्नन रह गई ये क्या हुआ कृष्ण ब्रह्मचारी ?

     

    जब गोपियाँ अगस्त्य ऋषि को भोजन करवा कर वापिस आने लगी तो अगस्त्य ऋषि से कहा की अब हम घर कैसे जाये यमुना जी बीच में है।

     

    अगस्त्य ऋषि ने कहा की तुम यमुना जी को कहना की अगर अगस्त्य जी निराहार है तो हमे रास्ता दे,

    गोपियाँ मन में सोचने लगी की अभी हम इतना सारा भोजन लाई सो सब गटका गये और अब अपने आप को निराहार बता रहे है?

     

    गोपियाँ यमुना जी के पास जाकर बोली, हे यमुना जी अगर अगस्त्य ऋषि निराहार है तो हमे रास्ता दे और यमुना जी ने रास्ता दे दिया ।

     

    गोपिया आश्चर्य करने लगी की जो खाता है वो निराहार केसे हो सकता है ?

     

    और जो दिन रात हमारे पीछे पीछे फिरता है वो ब्रह्मचारी केसे हो सकता है ?

     

     इसी उधेड़ बूंद में गोपियों ने कृष्ण के पास आकर फिर से वही  प्रश्न किया,

     

    भगवान श्री कृष्ण कहने लगे गोपियों मुझे तुम्हारी देह से कोई लेना देना नही है, मैं तो तुम्हारे प्रेम के भाव को देख कर तुम्हारे पीछे आता हूँ. मैंने कभी वासना के तहत संसार नही भोगा मैं तो निर्मोही हूँ इस लिए यमुना ने आप को मार्ग दिया,

     

    तब गोपियाँ बोली भगवन मुनिराज ने तो हमारे सामने भोजन ग्रहण किया फिर भी वो बोले की अगत्स्य आजन्म उपवाशी हो तो हे यमुना मैया मार्ग देदे !!!!!!!!!!!!

    और बड़े आश्चर्य की बात है कि यमुना ने मार्ग देदिया!!!!!!!

     

    श्री कृष्ण हंसने लगे और बोले कि अगत्स्य आजन्म उपवाशी है ।

    अगत्स्य मुनि भोजन  ग्रहण करने से पहले मुझे भोग लगाते है 

    और उनका भोजन में कोई मोह नही होता उनको कतई मन में नही होता की मैं भोजन करु या भोजन कर रहा हूँ

    वो तो अपने अंदर रह रहे मुझे भोजन करा रहे होते है इस लिए वो आजन्म उपवासी हैं।

     

    जो मुझसे प्रेम करता है मैं उनका सच में ऋणि हूँ मैं तुम सबका ऋणि हूँ।

    राधे राधे।


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    हनुमान


    श्री हनुमान चालीसा

    -: दोहा :-
    श्रीगुरु चरन सरोज रज, निजमनु मुकुरु सुधारि
    बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि
    बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार
    बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार



    हनुमान जी की आरती

    आरती कीजै हनुमान लला की।
    दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

    जाके बल से गिरिवर कांपे।
    रोग दोष जाके निकट न झांके।।


    श्री शनि देव

    Jagannathv
    शनि चालीसा

    ॥दोहा॥
    जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल ।दीनन के दुःख दूर करि, कीजै नाथ निहाल ॥ जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज ।करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज ॥

    Jagannathv
    शनि कवचं

    अथ श्री शनिकवचम्
    अस्य श्री शनैश्चरकवचस्तोत्रमंत्रस्य कश्यप ऋषिः IIअनुष्टुप् छन्दः II शनैश्चरो देवता II शीं शक्तिः II शूं कीलकम् II शनैश्चरप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः IIनिलांबरो नीलवपुः किरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान् II

    श्री राम

    Jagannathv

    श्री राम चालीसा

    श्री रघुवीर भक्त हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
    निशिदिन ध्यान धरै जो कोई। ता सम भक्त और नहिं होई॥1॥
    ध्यान धरे शिवजी मन माहीं। ब्रह्म इन्द्र पार नहिं पाहीं॥
    दूत तुम्हार वीर हनुमाना। जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना॥2॥

    Jagannathv

    आरती श्री राम जी

    श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन, हरण भवभय दारुणम्।
    नव कंज लोचन, कंज मुख कर कंज पद कंजारुणम्॥
    श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन
    कन्दर्प अगणित अमित छवि, नव नील नीरद सुन्दरम्।
    पट पीत मानहुं तड़ित रूचि-शुचि