भगवान शिव किसके पुत्र है?

भगवान शिव किसके पुत्र है

शिव का अर्थ है ई+शव=ईश्वर निराकार ओर शव साकार। यदि ई शब्द हटा दे तो केवल शव बचता है ओर तत्वों में मिल जाता है। इसलिए हर जीव साकार में आत्मा रुपी ईश्वर रहता है जो शव को चलाए हुए हैं। इसी भेद का नाम शिव है।

जो सब शरीरों में रम रहा है। अब आते हैं प्रलय यानी डमरू पर अर्थात जो जीव के शरीर में दिल धडकता है तो उसकी आवाज़ डम डम डम डम, धक धक धक धक होती है जब धडकन बदं हो जाती है तो ये केवल शव रह जाता है। ओर सत्य ज्ञान को जानने वाले की आत्मा ईश्वर में मिल जाती है।

भगवान् शिव का हर अस्त्र शस्त्र व हर क्रिया मनुष्य को मोक्ष का रास्ता बताती हैं। जैसे मन्त्र ओउम को ही ले ये काल निरजंन का भेद हैं। जिसने 5 तत्व 3 गुण प्रकट किये जिससे सब शरीर व ब्रम्हांड चाँद सितारे व आकाशगंगा बने हुए हैं।

ओर एक दिन ये नष्ट होने पर तत्वों में मिल जाते हैं। फिर बनते हैं ये सिलसिला अनतं है। बनाना बिगाडना की क्रिया को शिव कहते हैं। ओर शिव ज्योत निरजंन से पैदा हुआ है क्योंकि 5 तत्व 3 गुण निरजंन ने प्रकट किये। अब विचार करो शिव व निरजंन को प्रकट कौन कर रहा है अर्थात इनका नामकरण किसने रखा जाहिर है वो उनको जानता होगा।

जैसे बच्चा पैदा होता है तो उसका कोई नाम नहीं होता पहचान के लिए बाद में नाम रखा जाता है। जाहिर है ईश्वर इन दोनों से अन्य है।

अब भी नहीं समझे तो आसान भाषा में बताता हूँ कि ये सब नाम इस समय प्रकट कौन कर रहा है, आप हम कर रहे हैं कि नहीं।

जब आप हम नहीं थे तो इनको कौन प्रकट कर रहा था। क्या नाम था इनका। जरा सत्य पर विचार करो लिखे शब्दों पर मत जाओ ये शब्द भी तो बाद में बने हैं। चलो मथंन करते हैं।

जिसने ये प्रकट किया वो साक्षी कहलाता है अर्थात अनाम है अबोल हैं निअक्षर है। उसका नाम हम परमात्मा /पोजिटिव जिवित पुर्ण ऊर्जा रख लेते हैं।

जो आत्मा रुप में हर शरीर को जिवित रखे हुए हैं। वही ईश्वर है बाकी शव है। दोनों का सयोंग शिव है अर्थात जीवात्मा। ये बहुत गहरा व गुढ रहस्य है यही जीवन का सार है।

पर ढोगींयों ने मनमानी से अर्थ का अनर्थ कर दिया। पर सच ये भी कि सत्य की खोज कोई विरला ही करता है। मानते सब पर जानते नहीं हैं। मानना पाखडं होता है ओर जानना शिव को पाना होता है।

इस प्रकार हर देव रुप में मुर्ति व उनके हर मन्त्र के पिछे जान विज्ञान का गहरा भेद छुपा हुआ है ओर 33 करोड मास्टर अर्थात डिग्री धारकों को देवता की सज्ञा दि हुई है। पर ज्यादातर मनुष्य बुद्धि, विवेक न लगाकर पाठ पुजा मन्त्र तन्त्र बनाकर पाखंड का हिस्सा बने हुए हैं।

इनके पाखडं को देखते हुए अर्थात संख्याबल को देखते हुए पाखडीं गुरुओं ने भी मनमाना ज्ञान देकर बिजनेस बनाकर खुद भगवान् बन गये हैं। ओर मनुष्यों के पाप पुण्य मिटाने की दुकान खोल रखी है।

ओर अज्ञानी जीव इनके झांसे में आसानी से फसं भी रहे हैं। ओर साथ में सब पवित्र ग्रंथों के ज्ञान का अनर्थ कर रहे हैं। याद रखो ऐसे अनमोल ज्ञान को हम स्वयं नष्ट कर रहे हैं जिससे हमारी आने वाली नस्लें बहुत प्रभावित होगी ओर इसके लिए हमारा अज्ञान व स्वार्थ दोषी होगा। मनुष्य के पास असीम बुद्धि ओर विवेक है इसलिए सत्य को खोजो ओर स्वयं परखो। ज्यादा मदद के लिये आप फोलो करके जान सकते हैं।

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