2019 Navratri – माँ दुर्गा कौन हैं?

2019 Navratri

महादेव की पत्नी दुर्गा, आदि पराशक्ति, जगदाम्बा, महाकाली, भवानी ये सभी एक ही ईश्वरीय शक्ति को दिए गए अलग-अलग नाम हैं। सभी रूप ब्रह्मांड की शक्ति या ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करते हैं और उन्हें माँ का स्थान देते हैं।

माँ दुर्गा ही संपूर्ण ब्रह्मांड की माता हैं। क्यूंकि वास्तविक दुनिया में एक स्त्री का माँ रूप ही बच्चों को जन्म देता है और उनकी रक्षा करता है।

शिव को ब्रह्मांड कहा गया है और माँ को उनकी शक्ति। माँ दुर्गा के सभी रूप नारी शक्ति से अवगत करते हैं और उन्हें सबसे उच्चतम स्थान ‘सृष्टि रचयता’ अर्थार्थ ‘माँ’ के स्थान दिया गया है।

माँ का वाहन एक शेर है जो की असीमित शक्ति और असीमित इच्छाओं पर माँ के नियंत्रण को दर्शाता है।

माँ दुर्गा महिषासुर मर्दिनी

2019 Navratri

महिषासुर नमक एक राक्षस था। उसने कठोर तपस्या की जिससे प्रसन्न हो कर भगवान ब्रह्मा ने उसे एक वरदान दिया। वरदान के अनुसार कोई भी उसे मार नहीं सकता था चाहे फिर वो देवता या भगवन ही क्यों न हो।

महिषासुर ने इस वरदान का दुरूपयोग करना शुरू कर दिया और तीनों लोकों में आतंक मचा दिया। उसने इन्द्र को सिंहासन से उतार दिया और स्वर्ग पर कब्ज़ा कर लिया, कई देवताओं से उनके राज्य छीन लिए, ऋषि मुनियों की तपस्या में विध्न उत्पन्न कर दिए।

सभी देवता महिषासुर से छुटकारा पाने के लिए त्रिदेव – शिव, विष्णु और ब्रह्मा की शरण में गए। भगवानों ने अपनी सभी शक्तियाँ महादेव की पत्नी पार्वती को दे दी और महिषासुर से अभी की रक्षा करने का दायत्व पार्वती जी को दे दिया।

इस कार्य को पूरा करने के लिए पार्वती जी ने भगवानों द्वारा दी गयी सभी शक्तियों को स्वीकार कर माँ दुर्गा का रूप धारण किया। माँ दुर्गा ने दुष्ट राक्षसों शुम्भ और निशुम्भ और चंड और मुंड को अपने काली रूप में मार डाला।

उसकी त्वचा काली हो गई और जीभ लाल हो गई। उसने अलग-अलग सिर और राक्षसों की खोपड़ी की एक माला पहनी थी, जिन्हे उन्होंने मार था।

उन्होंने महिषासुर से भी सभी को मुक्ति दिलायी। एक बार रक्बीज नामक दुष्ट राक्षस का वध करने के बाद, माँ काली इतनी क्रोधित हो गईं कि वह पूरे ब्रह्मांड को नष्ट करने वाली थीं। कोई भी उन्हें शांत नहीं कर पा रहा था,

तब भगवान शिव ने खुद माँ के सामने जमीं पर लेट गए और आगे बढ़ते हुऐ माँ ने पैर शिव जी के शरीर पर रख दिया।

शिव जी शरीर पर पैर रखते ही माँ को अपनी गलती का एहसास हुआ उनकी लाल सुर्ख जीब उनके मुँह से बहार आ गयी और वे रुक गयी।

किंवदंतियों के अनुसार माँ दुर्गा सिर्फ पार्वती जी का शक्तियों से परिपूर्ण रूप ही नहीं है बल्कि वह ऊर्जा का दिव्य स्रोत है जिसमें से त्रिमूर्ति देवताओं सहित सभी ने जन्म लिया।

2019 Navratri

माँ की मुस्कुराहट ने ब्रह्मांड का निर्माण किया और उसका क्रोध ब्रह्मांड का विनाश कर सकता है। वह अंत है और वह शुरुआत है। माँ दुर्गा को अग्नि से जोड़कर भी देखा जाता है क्यूंकि अग्नि में भी आपार शक्ति होती है और उन्हें ज्वाला या ज्योतिवाली माँ भी कहा जाता है।

ज्वालाजी मंदिर हिमाचल प्रदेश में ज्वाला के रूप में मां दुर्गा की अखंड ज्योत। यह मंदिर माँ के 51 शक्तिपीठों में से एक है। शक्तिपीठ माँ दुर्गा को समर्पित दिव्य स्थान हैं।

शक्तिपीठों के बारे में कहा जाता है की जब सती से महादेव से अपने प्रेम के बारे में अपने पिता दक्ष को बताया तो उन्होंने स्वीकार नहीं किया। पिता के इस निर्णय से दुखी हो के सती ने खुद को आग के हवाले कर दिया। महादेव सती के इस निर्णय से अपना आप खो बैठे, वे सती के जले हुऐ शरीर के साथ सभी लोकों में भटकने लगे।

तब भगवान विष्णु ने शिव के दुःख को शांत करने के लिए सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को इकावन अलग-अलग भागों में बाँट दिया। यह सभी हिस्से भारत के विभिन्न स्थानों पर गिरे और उन्हें शक्तिपीठ के रूप में जाना जाने लगा।

माँ दुर्गा मोक्ष है।

माँ दुर्गा कर्म है।

माँ दुर्गा शक्ति हैं।

माँ दुर्गा महामाया है।

माँ दुर्गा सभी व्याख्याओं से परे हैं।

माँ दुर्गा हमें सत्य की ओर ले जाती हैं।

माँ दुर्गा हमारे जीवन से अंधकार को दूर करती हैं।

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महादेव के पहनावे और उस के पीछे के रहस्य – ऐसे तथ्य जो शायद आपको नहीं पता 


महादेव चित्र में आपने देखा होगा की वो शरीर के निचले हिस्से में व्याघ्र चर्म से लपेटे रहते हैं, देह पर भस्म है, एक हाथ में डमरू और दुसरे में त्रिशूल है, मस्तिष्क पर तिसरी आंख है और गले में रुद्राक्ष की माला है सर्प भी लिप्त हुआ है। वे कैलाश पर्वत पर बैठे हैं और वृषभ की सवारी करते हैं। जटाएँ काफ़ी बड़ी हैं और उनमे आधा चंद्र है  साथ ही केशों से गंगा निकल रही है। 

 

आइये हम इन सभी चिन्हों के पीछे छुपे रहस्य और उनके अर्थों से आपका परिचय करते हैं 

महादेव
– महादेव देह पर दो प्रकार की चार्म धारण करते हैं हस्ति चर्म और व्याघ्र चर्म। हस्ति चर्म हाथी की चार्म होती है, हाथी में उसके विशाल और बलशाली शरीर के कारण अहंकार होता है। व्याघ्र चर्म शेर के चार्म को कहा जाता है और शेर बहुत ही हिंसक प्रवृति का होता है। शिव जी हस्ति चर्म और व्याघ्र चर्म धारण भी करते हैं और उस पर विराजमान भी होते हैं जिसका अर्थ होता है की महादेव का अहंकार और हिंसा दोनों पर ही पूरा नियंत्रण है। यह सभी शिव भक्तों को अहंकार और हिंसा पर नियंत्रण रख उसे दबाने के लिए प्रेरित करता है। 
 
महादेव
 
– देह पर भस्म – भस्म बदलाव का प्रतिक है। भस्म अंत का प्रतीक है।सुन्दर या कुरूप, विशाल या सुक्ष्म, उपयोगी या अनुपयोगी, जीवित या मृत, चलित या स्थायी, आमिर या गरीब, स्वस्थ या बीमार एक दिन सब कुछ भस्म के रूप में बदल जायेगा। महादेव हमे बताना कहते हैं की जब संसार में सब कुछ भस्म हो जायेगा तब केवल भस्म ही शेष रह जाएगी। भस्म मोह, आकर्षण, लालच, ईर्ष्या से मुक्ति का सन्देश देती है।
 
 
महादेव
– महादेव के एक हाथ में त्रिशूल रहता है – त्रिशूल में एक ही दिशा में प्रहार करने वाली तीन नोंक शूल होती हैं जो की एक ही वॉर में तीन लक्ष्यों को भेद सकती हैं। हम त्रिशूल को तीन शाक्तियों का एक में समावेश वाले अस्त्र के रूप में भी देख सकते हैं। जैसे की त्रिदेव, हमारे तीन देव – ब्रह्माः, विष्णु और महेश। तीन देवियां सरस्वती, लक्ष्मी और काली। प्रकृति के तीन रूप सृजन, अनुरक्षण और विनाश। तीन काल – भुत, वर्तमान और भविष्य। तीन शक्तियां – सत, रज और तम। तीन लोक – स्वर्ग लोक , भू लोक और पातळ लोक। तीन मनोस्थिती – ईच्छा, कर्म और विवेक। तीन प्रकार के कष्ट – शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक। त्रिशूल बताता है की शिव तीनों भूमिकाओं के अधिपति हैं। 
महादेव
–  महादेव के एक हाथ में डमरू रहता है  – महादेव को संगीत का जनक भी मन जाता है। जब महादेव आनंद फैलाना कहते हैं तब वे डमरू बजाते हैं और नृत्य करते हैं। डमरू हम मनुष्यों को अपने दैनिक कर्त्तव्यों बीच समय निकाल प्रसन और आनंदित होने का संकेत देता है। 
 
महादेव
– मस्तिष्क पर तिसरी आंख – जिसे त्रिनेत्र भी कहते हैं और महादेव को ‘त्रिलोचन’ भी कहा जाता है। शिव जी का तीसरा नेत्र आधा बंद और आधा खुला हुआ है जो हमे संसार और सन्यास का सन्देश देता है की ध्यान-साधना या संन्यास में रहकर भी संसार की जिम्मेदारियों को निभाया जा सकता है। 

 

महादेव

– गले में सर्प – ऐसा माना जाता है की समुद्र मंथन के समय जब विष निकला तो देवता और असुर दोनो ही भयभीत हो गये और महादेव गए की वे ही कोई रास्ता सुझाएँ। विश्व की रक्षा करने के लिए शिव जी ने विष पि लिया किन्तु इससे पहले की वे विष निगल पाते पार्वती जी ने उनके कंठ को दबा दिया और विष के कारण महादेव का कंठ नीला पड़ गया। नीले कंठ के कारण  महादेव को नीलकंठ भी कहा जाता है। पार्वती जी के लिये सदा ही शिव जी के कंठ को दबा के रखना संभव नहीं था और इसलिए उन्होंने सर्प को शिव जी के गले में बांध दिया। कुछ और मान्यताओं के अनुसार शिव जी के गले में सर्प महादेव की डर और मृत्यु पर नियंत्रण को दर्शाता है। शिव जी को पशुपतिनाथ भी कहा जाता है जिसका अर्थ होता है सभी जिव-जन्तुओं के स्वामी। 

महादेव
– रुद्राक्ष की माला – ऐसा माना जाता है की रुद्राक्ष की उत्पत्ति शिव के आँसुओं से हुई थी। रुद्राक्ष में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है जो की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा का संतुलन बनाये रखता है। रुद्राक्ष की माला से मंत्र जाप करने से मंत्र का असर कई गुना बढ़ जाता है और ग्रहों को नियंत्रित करने के लिए सबसे रुद्राक्ष को सबसे उत्तम माना गया है।  
महादेव
शिव की सवारी नन्दी

– शिव की सवारी नन्दी – शिलाद ऋषि को महादेव की तपस्या कर नन्दी नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। एक बार उनके आश्रम पर दो संन्यासियों का आगमन हुआ और नन्दी की सेवा से प्रसन हो कर उन्होंने शिलाद ऋषि को दीर्घायु होने का आशीर्वाद दिया। शिलाद ऋषि ने जब इसका कारण पुछा को संन्यासियों ने कहा की नन्दी अल्पायु है यह सुन शिलाद ऋषि काफी चिंतित रहने लगे। जब नन्दी को पिता की चिंता का कारण पता चला तो उन्होंने शिव जी की घोर तपस्या की। महादेव नन्दी से प्रसन हुऐ और नन्दी को वरदान माँगने को कहा, इस पर नन्दी ने कहा की वो सारा जीवन महादेव के साथ रह कर उनकी सेवा करना चाहता है। शिव जी नन्दी से बहुत प्रसन हुऐ और उन्होंने नंदी को अपना परम मित्र बनाया और बैल का स्वरूप दे अपने वाहन के रूप में स्थान दिया।

महादेव
कैलाश पर्वत

– कैलाश पर्वत – महादेव के बारे में यह कहा जाता है की वे कैलाश पर्वत पर विराजमान हैं। कैलाश पर्वत हिमालय पर्वत श्रंखला में है और बहुत ही पवित्र माना जाता है। कैलाश पर्वत उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव  बिलकुल बीच में स्थित है और इसलिए इसे धरती का केंद्र भी कहा जाता है। कैलाश को दुनिया की नाभि या आकाशीय ध्रुव और भौगोलिक ध्रुव का केंद्र भी माना जाता है। यह आकाश और पृथ्वी के बीच एक ऐसा बिंदु है जहाँ दसों दिशाएँ मिल जाती हैं। कैलाश पर्वत अलौकिक शक्ति का केंद्र है। कैलाश पर्वत पर मानसरोवर जो की सूर्य के आकर की दुनिया की शुद्ध पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और दुनिया की उच्चतम खारे पानी की झीलों में से एक राक्षस जो की चंद्र के आकर की है, स्थित हैं। ये दोनों झीलेँ  सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा को दर्शाती हैं। दक्षिण से देखने पर एक स्वस्तिक चिह्न देखा जा सकता है। ऊपरोक्त सभी बातें कैलाश पर्वत को रहस्य्मय बनती हैं। 

महादेव

महादेव की जटाओं चंद्रमा और गंगा – समुद्र मंथन के समय जब शिव जी ने विष पि लिया था तो  शरीर का तापमान बढ़ने लगा और तापमान को काम करने लिए शिव जी ने चन्द्रमा को अपनी जटाओं धारण कर लिया। चन्द्रमा को मन का करक भी कहा गया है और शिव जी हमे चन्द्रमा की शीतल प्रवृति के अनुसार अपने मन को शांत रखने का सन्देश हैं। महादेव की जटाओं से गंगा का प्रवाह हमे अहँकार से बचने का संदेश देता है। इसके पीछे की मान्यता है की जब राजा भागीरथ ने गंगा से पृथ्वी पर आने का आग्रह किया तो गंगा ने कहा की अगर वे सीधे स्वर्ग से पृथ्वी पर आयेंगी तो पृथ्वी उनके वेग से ध्वस्त हो जाएगी। राजा भागीरथ ने यह बात भोलेनाथ को बताई और कहा की अब आप ही संसार के उद्दार के लिए के लिये कुछ करें। महादेव ने गंगा को स्वर्ग से अपने सिर पर उतरने को कहा और फिर उसे अपनी जटाओं में कैद कर लिया। गंगा सब कुछ करने के बाद भी शिव जी की जटाओं से निकल ना सकी और अपने अहँकार के लिए क्षमा माँगी। तब शिव ने अपनी जटाओं से गंगा को एक पोखर में छोड़ा और फिर गंगा वहाँ से सात धाराओं में प्रवाहित हुई


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Mehandipur balaji maharaj

Mehandipur balaji maharaj | पवित्र और चमत्कारिक मेहंदीपुर बालाजी महराज की सम्पूर्ण कथा!!!!!

Mehandipur balaji maharaj राजस्थान के सवाई माधोपुर और जयपुर की  सीमा रेखा पर स्थित मेहंदीपुर बालाजी ( Mehandipur balaji maharaj )कस्बे में बालाजी का एक अतिप्रसिद्ध तथा प्रख्यात मन्दिर है जिसे “श्री मेंहदीपुर बालाजी मन्दिर” के नाम से जाना जाता है।  भूत प्रेतादि ऊपरी बाधाओं के निवारणार्थ यहांँ आने वालों का ताँंता लगा रहता है। […]


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श्री संकट मोचन हनुमान जी  ( Shree Sankat mochan hanuman ji ) देश के ऐतिहासिक मंदिरों में शामिल काशी के संकट मोचन मंदिर ( Shree Sankat mochan hanuman ji ) का इतिहास करीब 400 साल पुराना है। इसी मंदिर में हनुमान ने राम भक्त गोस्वामी तुलसीदास को दर्शन दिए थे, जिसके बाद बजरंगबली मिट्टी का स्वरूप […]


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महादेव


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Ambernath shiv temple कोंकण का सबसे प्राचीन शिव मंदिर – अम्बरनाथ / अमब्रेश्वर शिव मंदिर 

Ambernath shiv temple अम्बरनाथ / अमब्रेश्वर शिव मंदिर मुंबई के पास अम्बरनाथ में स्थित है जिसे की यूनेस्को ने सांस्कृतिक विरासत का स्थान दिया है। अम्बरनाथ / अमब्रेश्वर शिव मंदिर के बारे में मान्यता है की यहाँ महादेव और पार्वती जी के दर्शन करने से संतान की कामना पूर्ण होती है। मंदिर का निर्माण 1060 […]


हनुमान


श्री हनुमान चालीसा

-: दोहा :-
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निजमनु मुकुरु सुधारि
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार



हनुमान जी की आरती

आरती कीजै हनुमान लला की।
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

जाके बल से गिरिवर कांपे।
रोग दोष जाके निकट न झांके।।


श्री शनि देव

Jagannathv
शनि चालीसा

॥दोहा॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल ।दीनन के दुःख दूर करि, कीजै नाथ निहाल ॥ जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज ।करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज ॥

Jagannathv
शनि कवचं

अथ श्री शनिकवचम्
अस्य श्री शनैश्चरकवचस्तोत्रमंत्रस्य कश्यप ऋषिः IIअनुष्टुप् छन्दः II शनैश्चरो देवता II शीं शक्तिः II शूं कीलकम् II शनैश्चरप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः IIनिलांबरो नीलवपुः किरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान् II

श्री राम

Jagannathv

श्री राम चालीसा

श्री रघुवीर भक्त हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
निशिदिन ध्यान धरै जो कोई। ता सम भक्त और नहिं होई॥1॥
ध्यान धरे शिवजी मन माहीं। ब्रह्म इन्द्र पार नहिं पाहीं॥
दूत तुम्हार वीर हनुमाना। जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना॥2॥

Jagannathv

आरती श्री राम जी

श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन, हरण भवभय दारुणम्।
नव कंज लोचन, कंज मुख कर कंज पद कंजारुणम्॥
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन
कन्दर्प अगणित अमित छवि, नव नील नीरद सुन्दरम्।
पट पीत मानहुं तड़ित रूचि-शुचि