हिन्दू धर्म परंपरायें अंध्विश्वास यावैज्ञानिक ज्ञान

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हिन्दू धर्म परंपरायें अंध्विश्वास यावैज्ञानिक ज्ञान

हिन्दू धर्म परंपरायें अंध्विश्वास यावैज्ञानिक ज्ञान

आज का विज्ञान इस बात को साबित करता है की हिन्दू धर्म की परम्पराएँ वैज्ञानिक ज्ञान पर आधारित हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी परंपराओं के रूप में चली आ रही हैं। अधूरे ज्ञान और हिन्दू धर्म को बदनाम करने की नियत से लोगों के बीच इस बात को फैलाया जाता रहा की सारी मान्यताएँ केवल अन्धविश्वास को बढ़ावा देती हैं। लोग वर्षों से इन परम्पराओं और रस्मों का पालन करते आ रहे हैं। हमारी ओर से एक छोटा सा प्रयास है की इन परंपराओं और रिवाजों में शामिल विज्ञान को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके और महत्त्व को साझा किया जा सके

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– मूर्ति पूजा –

मूर्ति पूजा हिन्दु धर्म का एक अभिन्न अंग है और वर्षों पुराणी प्रथा एवं मान्यता के अनुसार प्रचारित रही हैं। मनोचिकित्सकों के अनुसार, आदमी अपने विचारों को जो देखता है उसके अनुसार आकर देता है, व्यक्ति की सोच उसके द्वारा देखी जा रही वास्तु अनुसार रूप लेती और बदलती है शोधकर्ताओं का कहना है कि मूर्ति के सामने होने से प्रार्थना के दौरान एकाग्रता बढ़ती है । इसी तरह, प्राचीन भारत में, मूर्ति पूजा की स्थापना इसलिए की गई थी ताकि जब लोग मूर्तियों को देखें तो उनके लिए आध्यात्मिक ऊर्जा हासिल करना और मानसिक मोड़ के बिना ध्यान लगाना आसान हो।

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– नमस्कार करना –

अभिवादन में हाथ जोड़ कर नमस्कार करने के लिए दोनों हाथों को जोड़ना होता है, हाथ जोड़ने से उँगलियों के कुछ विशेष पॉइंट्स पर दबाव बढ़ता है, जो की बड़ी के कई अंगों से जुड़े होते है और शरीर के इन अंगों कार्य सुधरते हैं।

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– चरण-स्पर्ष की वैज्ञानिक व्याख्या –

हिन्दु मान्यताओं में हम अपने से बड़े या पवित्र व्यक्ति के सम्मान स्वरुप चरण-स्पर्ष करते हैं। ऐसा करने से हमारे हाथ की नसों से निकलने वाली ऊर्जा सम्मानीय व्यक्ति के पैरों से निकलने वाली ऊर्जा से मिलती है और एक सर्किट बनता है जो की दोनों दो शरीर की ऊर्जाओं को जोड़ता है। आपकी उंगलियां और हथेलियां ऊर्जा के ‘रिसेप्टर’ बन जाते हैं और दूसरे व्यक्ति के पैर ऊर्जा के ‘दाता’ बन जाते हैं। इसके अलावा जब हम किसी के आगे उसके सम्मान में झुकते हैं और उनको अपने से ऊपर का स्थान देते हैं और यह भावना हमें अपने अहंकार को नियंत्रण में ला सयम को बढ़ावा देती है।

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– मंदिर में जो माथे पर भौंह के बिच में तिलक लगाया जाता है उससे हमारे दिमाग के ख़ास हिस्से पर दवाब पड़ता है। इससे कॉन्सेंट्रेशन बढ़ता है।

– रिसर्च कहती है, जब हम मंदिर का घंटा बजाते हैं, तो 7 सेकण्ड्स तक हमारे कानों में उसकी आवाज़ गूंजती है। इस दौरान शरीर को सुकून पहुंचाने वाले 7 प्वाइंट्स एक्टिव हो जाते हैं। इससे एनर्जी लेवल बढ़ाने में हेल्प मिलती है।

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