श्री गणेश का वाहन एक माउस है जिसका नाम दिनक है

श्री गणेश का वाहन

प्राचीन समय में सुमेरू पर्वत पर सौभरि ऋषि आश्रम था। उनकी अत्यंत ही पतिव्रता और रूपवती पत्नी थी जिसका नाम मनोमयी था।  एक दिन जब सौभरि ऋषि लकड़ी लेने के लिए वन में गए थे ।
उसी समय एक दुष्ट कौंच नामक गंधर्व वहाँ आया और उसने बहुत ही सूंदर मनोमयी को देखा तो व्याकुल हो उसने ऋषि पत्नी का हाथ पकड़ लिया।
उसी समय सौभरि ऋषि आ गए। उन्होंने गंधर्व को श्राप देते हुए कहा ‘तूने मेरी पत्नी का हाथ पकड़ने का अपराध किया है , इस कारण तू अब से सदा के लिए , मूषक बन धरती के नीचे चोरी करके अपना पेट भरेगा।

श्री गणेश का वाहन

श्राप सुन कर गंधर्व डर गया और मुनि से क्षमा माँगने लगा उसने हाथ जोड़ कर विनती की की ‘दयालु मुनि, भूल वश और अविवेक के कारण मैंने आपकी पत्नी को स्पर्श किया था।
कृपया मुझे क्षमा कर दें। उसकी क्षमा याचना सुन ऋषि ने कहा मेरा श्राप व्यर्थ नहीं होगा, लेकिन द्वापर में महर्षि पराशर के यहाँ गणपति देव गजमुख पुत्र रूप में प्रकट होंगे तब तू उनकाडिंक नामक वाहन बन जाएगा, जिससे देवगण भी तुम्हारा सम्मान करने लगेंगे।
और सारे विश्व तब तुझें श्रीडिंकजी कहकर वंदन करेंगे।

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