शिवलिंग का अर्थ और उससे जुड़ी मान्यताऐं

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जानकारी और ज्ञान के आभाव के कारण शिवलिंग को कुछ लोग पुरुष के शरीर के एक अंग से सम्बंधित कर भ्रमित करते हैं जबकि यह सच नहीं है।  भारत की संस्कृति और सभ्यता संसार की प्राचीनतम संस्कृतियों में से है और कई पौराणिक शास्त्रों में इसके प्रमाण मिलते है की भारत की संस्कृति, सभ्यता, भाषा बहुत ही उन्नत थी। 

3,500 वर्षों से भी ज़्यादा से संस्कृत भाषा हिंदू धर्म की प्राथमिक साहित्यिक भाषा है और हिंदू दर्शन के अधिकांश कार्यों की प्रमुख भाषा के साथ-साथ बौद्ध और जैन धर्म के कुछ प्रमुख ग्रंथ संस्कृत में हैं।  भाषा के विकास में क्षेत्र, सभ्यता, संस्कृति उसके आस पास के कई देशों की संस्कृति और सभ्यता की झलक होती है और ऐसा ही दूसरे क्षेत्र की भाषा में भी देखा जा सकता है।

चीनी भाषा में लीग का अर्थ ‘आत्मा, अंत:मन’ होता है, संस्कृत भाषा में लिंग का अर्थ होता है‘चिन्ह या प्रतिक’ जो की कई सारी सम्मिलित चीजों और भावनाओं का सार है।  इसी प्रकार शिव लिंग का अर्थ है ‘शिव का चिन्ह’ ‘शिव का प्रतिक’ एक चिन्ह जो की हमे शिव की याद दिलाता है। शिव जो की सर्वव्यापी है, निराकार हैं, हर भक्त के हृदय में हैं, जो सभी के लिए एक सामान है, वह आपका निवास स्थान, आपका अंतरतम या आत्ममान है। 

शिवलिंग मौन की भाषा में भक्त से संवाद करता है। प्राचीन हिंदू ग्रंथ “लिंग पुराण” कहता है कि सबसे महत्वपूर्ण लिंग गंध, रंग, स्वाद आदि से रहित है, और इसे प्राकृत या प्रकृति के रूप में जाना जाता है। वैदिक काल के बाद में, लिंग भगवान शिव की उत्पत्ति शक्ति का प्रतीक बन गया। लिंग एक अंडे की तरह है और ब्रह्माण्ड का प्रतिनिधित्व करता है। 

लिंग संकेत करता है कि सृष्टि प्रकृति और पुरुष की प्रकृति के पुरुष और महिला शक्तियों के मिलन से प्रभावित है। यह सत्य, ज्ञान, और अनंत – सत्य, ज्ञान और अनंत का भी प्रतीक है।  लिंग ध्यान केंद्रित करने और मन की एकाग्रता को प्रेरित करने के लिए मन जाता है, इसमें एक रहस्यमयी या अवर्णनीय शक्ति है। और इसीलिए प्राचीन काल से इसे भारत के बहुदिजीवियों, ऋषि-मुनियों ने शिव के मंदिरों में स्थापित करवाया और तभी से यह परंपरा बन गयी। 

आज लिंग भक्तों के लिए पत्थर का टुकड़ा नहीं है बल्कि उसके लिए तो पवित्र शक्ति का प्रतिक है, सबसे ऊपर है क्यूंकि लिंग उसे मार्ग दिखता है, शरीर चेतना को ऊपर उठता है, शिव के साथ संवाद करने में मदद करता है। विद्वान रावण ने रहसयमयी शक्तियों को पाने के लिए स्वर्ण लिंग की पूजा की थी और भगवान राम ने लंका तक पुल बनाने के पहले रामेश्वरम में शिव लिंग की पूजा की थी।

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