शंकर भगवान के पूर्णावतार काल भैरव

शंकर भगवान के पूर्णावतार काल भैरव
भैरव: पूर्णरूपो हि शंकरस्य परात्मन:’ । (शिवपुराण)
 
काल भैरव और शंकर भगवान
एक बार सुमेरु पर्वत पर सभी देवता, ऋषिगण ब्रह्मा और विष्णु बैठे थे। वार्तालाप करते हुऐ ऋषियों ने ब्रह्माजी से बोले की भगवानों में सबसे श्रेष्ठ शिव है, पर ब्रह्माजी ने आत्मप्रशंसा में अंहकार के साथ कहा की ‘सिर्फ मैं ही सरे जगत का कर्ता, धर्ता व हर्ता हूँ, सबसे श्रेष्ठ भी मैं हूँ और सब बड़ा भी मैं ही हूँ’ 
पर यह सुनते ही विष्णुजी क्रोधित हो गए और उन्होंने खुद को परमपुरुष और श्रेष्ठ बताया और इस बात पर ब्रम्हा और विष्णु के बिच विवाद की स्तिथि आ गयी। दोनों ही भगवान अपने आप को श्रेष्ठ और परमपुरुष के स्थान पर देखते थे। और इसलिए उन्होंने वेदोँ से जानना चाहा की दोनों में से श्रेष्ठ कौन है।  पर वेदों के अनुसार भी शिव ही सबसे श्रेष्ठ और ऊपर आते थे। यह सुन ब्रम्हा और विष्णु वेदों पर बिगड़ गए और बोले की ‘वह अशुभ वेषधारी जिसके गले में हमेशा सर्प लिपटा रहता है जो मुर्दों की रख अपने शरीर पर मलता है, जिसकी जटाएं इतनी लम्बी हैं, वस्त्रों की जगह जानवरों की खाल पहनता है , डमरू बजा कर नृत्य करने वाला अघोरी शिव परमतत्त्व कैसे हो सकता है ?’ तब प्रणव ने भी मूर्तरूप धारणकर शिव को परमतत्त्व बताया । लेकिन फिर भी ब्रह्मा व विष्णु नहीं माने और तभी एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई । उसे देखकर ब्रह्माजी  अहंकार में भरकर बोले—‘मुझसे डरो मत, तुम तो मेरे मस्तक से पैदा हुए थे । रोने के कारण मैंने तुम्हारा नाम ‘रुद्र’ रखा था । तुम मेरी शरण में आ जाओ ।’
 
 
काल भैरव
काल भैरव
यह सब देख शिव जी को क्रोध आ गया और ब्रह्मा को दण्डित करने के लिए शिव जी ने अपने तेज से ‘भैरव’ नामक दिव्य पुरुष उत्पन्न किया और बोले —’ सब तुमसे डरेंगे, काल भी डरेगा और इसलिए तुम्हारा नाम ‘काल भैरव’ होगा । तुम काल के समान शोभायमान हो, इसलिए तुम्हारा नाम ‘कालराज’ होगा । तुम क्रोध में दुष्टों का मर्दन करोगे, इसलिए तुम्हारा नाम ‘आमर्दक’ होगा । भक्तों के पापों को दूर करने के कारण ‘पापभक्षण’ कहलाओगे । सबसे पहले तुम इस ब्रह्मा को दण्ड दो । सभी पुरियों में श्रेष्ठ मेरी जो मुक्तिदायिनी काशीपुरी है, आज से तुम वहां उसके अधिपति बनकर रहोगे ।
 
शंकर भगवानके आदेश पर  काल भैरव ने अपनी बायीं ऊंगली के नाखून से ब्रह्माजी के पांचवें मुख को काट डाला। ब्रह्मा-विष्णु भयभीत हो गए उनका अहंकार नष्ट हो गया  और दोनों शंकरजी के शतरुद्रिय मन्त्रों का जप करने लगे । कटा हुआ मुख काल भैरव के हाथ में चिपक गया और ब्रह्महत्या स्त्री रूप धारण करके उनका पीछा करने लगी । भगवान शंकर ने उन्हें प्रायश्चित के रूप में कापालिक व्रत धारण करने व भिक्षावृत्ति अपनाने के लिए कहा । प्रायश्चित कर घूमते हुऐ भगवान भैरव वाराणसी के ‘कपालमोचन तीर्थ’ पहुंचे और पहुँचते ही ब्रह्मा जी का चिपका हुआ सर उनके हाथ से निकल गया ब्रह्महत्या पाताल में प्रविष्ट हो गयी । तभी से इस तीर्थ में आकर स्नान करने व देवताओं व पितरों का तर्पण करने से मनुष्य को ब्रह्महत्या से छुटकारा मिल जाता है ।
 
काल भैरव – काशीपुरी (वाराणसी) के अधिपति, क्षेत्रपाल व नगरपाल हैं । वाराणसी की आठ दिशाओं में आठ भैरव स्थित हैं, जिनके नाम हैं—
 
रुरु भैरव,
चण्ड भैरव,
असितांग भैरव,
कपाल भैरव,
क्रोध भैरव,
उन्मत्त भैरव,
संहार भैरव, व  
भीषण भैरव ।
 
भगवान काल भैरव को प्रिय पूजन-सामग्री
रोली, सिन्दूर, रक्तचंदन, लाल फूल, गुड़, उड़द का बड़ा, धान का लावा (खील), गन्ने का रस, तिल का तेल, लोहबान, लाल वस्त्र, केला, सरसों का तेल—इन सामग्रियों से काल भैरव का पूजन करने से वे शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं ।
 
प्रदक्षिणा
प्रतिदिन भैरवजी की आठ परिक्रमा करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं ।
 
51 शक्तिपीठों की रक्षा करते हैं काल भैरव
देवी के 51 शक्तिपीठों की रक्षा कालभैरव भिन्न-भिन्न नाम व रूप धारण करके करते हैं और भक्तों की प्रार्थना मां दुर्गा तक पहुंचाते हैं ।
 
भगवान शंकर के पूर्णावतार काल भैरव का अवतार मार्गशीर्ष (अगहन) मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथी को हुआ था । इस दिन इनकी पूजा अत्यन्त फलदायी है । साथ ही मंगलवार की अष्टमी और चतुर्दशी को काल भैरव के दर्शन करने का विशेष महत्व है । 
 
इनकी उपासना से –
– मनुष्य की विपत्तियों का नाश होता है
– कामनाओं की पूर्ति होती है,
– लम्बी आयु मिलती है,
– साथ ही मनुष्य यशस्वी और सुखी रहता है ।
– ब्रह्माजी के गर्वहरण के लिए भगवान शंकर का भैरव अवतार

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