प्रदोष काल में मनोकामना पूर्ति के लिए शिव पूजा

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प्रदोष काल गोधुली बेला भी कहा जाता है, वह शाम का समय जब दिन का अंत हो रहा होता है और रात का आगमन नहीं हुआ होता है। यह वो समय होता है जब चरवाहे अपने पशुओं को ले कर गाँव की तरफ लौट रहे होते हैं ,पक्षी घौंसलों पर जा रहे होते हैं, किसान घर जा रहा होता है , सूर्य डुब चूका होता है पर उसका थोड़ा उजाला होता है और रात्रि धीरे-धीरे आ रही होती है। यह बहुत ही मनोरम समय होता है और वातावरण बहुत ही मनमोहत होता है।  ऐसा मन जाता है की इस समय शिव जी भी बहुत ही आनंदमय हो कर कैलाश पर्वत पर डमरू बजाते हुऐ नृत्य करते हैं और बाकि सभी भगवन भी जैसे की सरस्वतीजी वीणा बजाकर, इन्द्र वंशी धारणकर, ब्रह्मा ताल देकर, महालक्ष्मीजी गाना गाकर, भगवान विष्णु मृदंग बजाकर भगवान शिव जी के आनंद में सम्मिलित होते हैं ।

प्रदोष व्रत शिव-पार्वती को प्रसन्न करें

भगवान शिव की प्रसन्नता व प्रभुत्व प्राप्ति के लिए हर महीने के शुक्ल व कृष्ण पक्ष में त्रयोदशी (तेरस) को ‘प्रदोष’ व्रत किया जाता है । शास्त्रों में कहा गया है कि प्रदोष व्रत रखने से दो गायों को दान करने के समान पुण्य फल प्राप्त होता है । देवी भागवत में प्रदोष को देवी व्रत माना गया है । उस दिन देवाधिदेव महादेव सायं काल के समय देवी पार्वती को कुशासन पर विराजमान कर उनके सामने देवताओं के साथ नृत्य करते हैं । इसलिए उपवास करके सायं काल में देवी पार्वती की भी पूजा करनी चाहिए ।

प्रदोष व्रत दरिद्रता से मुक्ति

जो व्यक्ति ऋण के भार और दरिद्रता से ग्रसित और दुखी है उसे इन पीड़ाओं से मुक्ति के लिया प्रदोष पूजा व व्रत का सहारा लेना चाहिए।

 

‘प्रदोष स्तोत्र’ के अनुसार

 

जो व्यक्ति प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा स्तुती करता है उसे ऋणों और दरिद्रता से मुक्ति मिलती है धन की प्राप्ति होती है और यदि राजा प्रदोष काल में भगवान शंकर की प्रार्थना करता है तो उसे दीर्घायु की प्राप्ति होती है, वह सदा नीरोग रहता है। राजकोष की वृद्धि व सेना की अभिवृद्धि (बढ़ोत्तरी) होती है ।

 

स्कन्दपुराण के अनुसार

 

जो लोग प्रदोष काल में भक्तिपूर्वक भगवान सदाशिव की पूजा करते हैं, उन्हें धन-धान्य, स्त्री-पुत्र व सुख-सौभाग्य की प्राप्ति और उनकी हर प्रकार की उन्नति होती है ।

प्रदोष व्रत वार का महत्त्व

दिन के अनुसार प्रदोष का महत्त्व बढ़ जाता है। यदि कृष्णपक्ष में सोमवार व शुक्लपक्ष में शनिवार को प्रदोष हो तो वह विशेष फलदायी होता है । अलग-अलग वार की प्रदोष का फल अलग है । अत: जिस भी कामना से प्रदोष व्रत किया जाता है उसी वार की प्रदोष से उसे आरम्भ करना चाहिए ।


– ‘सोमप्रदोष’ शान्ति और रक्षा प्रदान करता है ।
– मंगलवार का ‘भौमप्रदोष’ व्रत ऋण से मुक्ति देता है ।
– बुध के दिन प्रदोष व्रत से कामनापूर्ति होती है ।
– बृहस्पतिवार के प्रदोष व्रत से शत्रु शांत होते हैं ।
– शुक्रवार की प्रदोष सौभाग्य, स्त्री सुख और समृद्धि के लिए शुभ होती है ।
– शनिवार का प्रदोष व्रत संतान सुख को देने वाला है ।
– रविवार का प्रदोष व्रत आरोग्य देने वाला है ।

प्रदोष में – शिव पूजा

– प्रदोष काल के पूर्व स्नान कर सफेद वस्त्र पहन कर शिव पूजन की व्यवस्था कर लें 
– अगरबत्ती, गूगल और धी का दिया लगायें 
– उत्तर की ओर मुख कर भगवन शिव का ध्यान करें ‘ॐ नमः शिवाय ‘ मन्त्र ११ बार बोलें 
– फिर आंख बंद कर शिव की से निवेदन करें ‘हे मेरे ईश्वर मुझे और मेरे परिवार को ऋण, दुर्भाग्य, दरिद्रता, भय, समस्त रोगों से रक्षा व समस्त पापों के नाश के लिए आप पार्वतीजी सहित पधारकर मेरी पूजा ग्रहण करें ।’
– ‘ॐ नमः शिवाय ‘ का उच्चारण करे रहें 
– शिव लिंग को शुद्ध जल से स्नान करायें 
– शिव लिंग को पंचामृत से स्नान करायें 
– पुनः शिव लिंग को शुद्ध जल से स्नान करायें 
– वस्त्र, यज्ञोपवीत, चंदन, अक्षत, इत्र, अबीर-गुलाल अर्पित करें 
– फुल और बेलपत्र चढ़ाएं 
– नैवेद्य अर्पण करें 
– शिव आरती करें 
– अपनी मनोकामना शिव जी के सामने मन में बोलें

११ बार मन्त्र बोलें

” भवाय भवनाशाय महादेवाय धीमते ।
रुद्राय नीलकण्ठाय शर्वाय शशिमौलिने ।।

उग्रायोग्राघ नाशाय भीमाय भयहारिणे ।
ईशानाय नमस्तुभ्यं पशूनां पतये नम: ।। ” 

– ॐ नम: शिवाय’ मन्त्र की ११ माला फेरे 
– प्रसाद का वितरण करें 
– अपनी श्रद्धा अनुसार ज़रूरतमंद को दान करें।

प्रदोष व्रत

– फलाआहार ग्रहण करें 
– अन्न ना ग्रहण करें 
– प्रदोष काल पूजा समाप्ति बाद ही भोजन ग्रहण करें 
– सात्विक भोजन ग्रहण करें 
– मांसाहारी भोजन न करें 
– तम्बाकू-पानमसाला, बीड़ी-सिगरेट , शराब का त्याग करें

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