क्यों कहलाते है भगवान् श्री गणेश एकदंत


श्री गणेश के एक टूटे हुए दांत की कहानी 

श्री गणेश के टूटे हुए दांत के बारे में दो कहानियाँ प्रचलित हैं।

पहली कहानी

क्यों कहलाते है भगवान् श्री गणेश एकदंत
BATTLE BETWEEN PARASHURAMA AND GANESH
क्यों कहलाते है भगवान् श्री गणेश एकदंत

पहली कहानी ब्रह्माण्ड पुराण के उपगोष्ठ पाद से प्राप्त हुई है।

इसके अनुसार शिव भक्त परशुराम जो की विष्णु के अवतार थे उन्होंने कार्तवीर्य अर्जुन और उन से सम्बन्ध रखने वाले राजाओं को हराया था। वे इसी जीत का धन्यवाद देने के लिए शिव जी के द्वार पहुँचे थे।

परशुराम शिव जी को इन दुश्मनों से लड़ने की शक्ति प्रदान करने के लिए कृतज्ञ थे और महादेव को आदर पुर्वक धन्यवाद करना कहते थे।

जब परशुराम कैलाश पर्वत पहुँचे और महादेव के दर्शन करने की लिए बढ़े तो गणपति जी ने उन्हें यह कह कर रोक दिया की महादेव देवी पारवती के साथ विश्राम कर रहे हैं और परशुराम उन्हें नहीं मिल सकते।

परशुराम और गणेश जी दोनों ही एक दूसरे से परिचित नहीं थे। बस इसी बात पर दोनों का विवाद हो गया जिसने की युद्ध का रूप ले लिया।

युद्ध में परशुराम ने शिव जी के दिए हुए फरसे से गणपति पर वॉर किया, चूँकि फरसा महादेव का था और उसका वॉर खाली नहीं जा सकता था गणपति जी ने अपने एक दाँत पर वॉर को लिया कर उनका दाँत टूट गया।

जैसे ही शिव जी को युद्ध के बारे में पता चला वे आये और दोनों का परिचय कराया। इस युद्ध में अपना एक दन्त खोने के बाद से गणेश का एकदन्त नाम प्रचलन में आया। 

दूसरी कहानी

क्यों कहलाते है भगवान् श्री गणेश एकदंत
VYASA NARRATING MAHABHARATA TO GANESHA
क्यों कहलाते है भगवान् श्री गणेश एकदंत

दूसरी कहानी के अनुसार ऋषि व्यास ने श्री गणेश को महाभारत लिखने का कार्य दिया।

गणपति यह कार्य करने की लिए तैयार हूँ गए किन्तु उन्होंने एक शर्त रखी की ऋषि व्यास बिना किसी रूकावट के निरंतर बोलते जायँगे जब तक की महाभारत का लेखन पूर्ण नहीं हूँ जाता।

ऋषि व्यास इस बात पर राजी हूँ गए और उन्होने गणेश जी के सामने अपनी शर्त रखी की गणपति को सिर्फ सुन कर लिखने नहीं होगा बल्कि समझ कर लिखना होगा।

अर्थार्थ जो भी ऋषि व्यास बोलेंगे गणपति को वो समझना होगा और फिर लिखना होगा। ऐसा करने से ऋषि को थोड़ा समय आराम का मिल जाता क्यूंकि सिर्फ लिखने और समझ के लिखने में थोड़ा समय लगता है।

दोनों ही एक दूसरे की शर्तों को समझ कर कार्य में लगे।काफी दिनों तक लेखन कार्य बिना रुके सुचारु चलता रहा।अंत के करीब एक दिन लिखने के दौरान गणपति जी की कलम टूट गयी पर शर्त के अनुसार कोई भी कार्य को अधूरा नहीं छोड़ सकता था

और इसलिए गणेश जी ने बिना विलंब अपने एक दाँत को तोड़ा और उसका उपयोग कलम के रूप में कर लेखन कार्य पूर्ण किया। इस पूरी कथा का सार है की ज्ञान प्राप्त करने के लिए बलिदान की कोई भी राशि बहुत अधिक नहीं है।

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श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन
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