कन्यादान का अर्थ

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कन्यादान  हिन्दू धर्म के हर विवाह का एक महत्वपुर्ण अनुष्ठान होता है कन्यादान। कन्यादान की रस्म में पिता अपनी पुत्री को वर को सौंपता है। कन्यादान की रस्म का बहुत ही गहरा मतलब होता है जो की कम ही लोगों को ज्ञात है।

कन्यादान की रस्म में पिता अपनी पुत्री को वर को सौंपता है और कामना करता है की हे वर मै अपनी प्यारी बेटी को आप को सौंप रहा हूँ। मेरी बेटी जो की मेरा धन है, मेरी लक्ष्मी है और जब वह तुम्हारे परिवार में आएगी तो अपने साथ सुख समृद्धि लाएगी। और साथ ही मैं निवेदन करता हूँ की मुझे सरस्वती के आशीर्वाद से बुद्धिमत्ता प्राप्त हो जिससे के मैं देने का आनंद को समझ सकूँ और उसका अनुभव कर सकूँ।

यह रस्म कन्यादान इसलिए कहलाई क्यूंकि पिता द्वारा बेटी का दान कर बुद्धिमत्ता पाने के कामना की गयी। दक्षिणा दे कर बदले में धन की कामना की जाती है, भिक्षा दे कर बदले में शक्ति या सत्ता की कामना की जाती है, जबकि दान ही एकमात्र ऐसा कार्य है जिसमे की बुद्धिमत्ता की कामना की जाती है। 

कन्यादान

शादी रस्मों में हवन कर दोनों परिवार के लोगों और वर वधु द्वारा दोनों हाथों को साथ रख घी, अन्न और अन्य वस्तुओं को हवन कुंड में समर्पित किया जाता है ताकि अग्नि से उत्पन्न धुऐं के साथ सारी वस्तुएँ गगन के ऊपर विराजमान भगवानों तक पहुँच सके।

साथ ही धरती पर भोग गाय, कुत्ते, कौवे, सांप, केले के पेड़ और पिपल, पत्थर और जल को चढ़ाया जाता है, इस क्रिया द्वारा यह बताया जाता है की मानवता अलगाव में नहीं रहती है बल्कि सभी के साथ है।

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